आठवीं शताब्दी में मंडन मिश्र की कृति ब्रह्मसिद्धि पर पहली बार देश के किसी विश्वविद्यलाय में सात दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में  गहन विमर्श किया गया. वेदांती व मीमांसा के प्रकांड मंडन मिश्र की ब्रह्मसिद्धि भारतीय दर्शन की अप्रितिम कृतियों में से एक है जिसका स्पष्ट परिचय अबतक बौद्धिक परम्परा में नहीं हुआ है, जिस पर कार्यशाला में आये विद्वानों ने चिंता प्रकट की.

भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली (ICPR) व भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित (18-24 मार्च) ‘मंडन मिश्र कृत ब्रह्मसिद्धि’ विषयक राष्ट्रीय कार्यशाला के समापन के अवसर पर जेएनयू के संस्कृत संकाय के प्रो राम नाथ झा ने भारतीय दर्शन की पढ़ाई जेएनयू के दर्शन केंद्र में नहीं होने पर क्षोभ व्यक्त किया.

प्रो राम नाथ ने कहा, “दर्शन का मूल श्रोत भारतीय दर्शन व चिंतन है. अभी भी लाखों टेक्स्ट व पांडुलिपि का अध्ययन होना बाकी है. क्या कारण है की मंडन की ब्रह्मसिद्धि पर अब तक कोई काम नहीं हुआ? जरूरत है मूल स्रोत में जाने की न की पाश्चात्य चिंतन व दर्शन की. भारतीय दर्शन में मिथिला के विद्वानों व मनीषियों का योगदान अतुलनीय है.”

इस राष्ट्रीय कार्यशाला के संयोजक प्रो देवशंकर नवीन ने समापन अवसर पर ब्रह्मसिद्धि के अनुवाद पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि 1300  वर्ष बाद भी हमलोग आज अनभिज्ञ हैं की मीमांसक मंडन मिश्र ने अपने ब्रह्मसिद्धि में क्या कहा है और उसका मूल तत्व क्या है, यह बात अब जनमानस के बीच आनी जाहिए. बहुत जल्द इन सात दिनों में हुए विमर्श का मूल लिप्यांतर पुस्तकाकार रूप में आएगी जो एक मार्गदर्शक होगा मनीषी मंडन मिश्र को समझने के लिए।

इन सात दिनों के कार्यशाल में चेन्नई से डॉ मणि शास्त्री द्रविड़, सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय, वाराणसी से डॉ राम किशोर त्रिपाठी, लाल बहादूर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के डॉ के एस सतीश व डॉ महानंद झा, बनारस हिन्दू विश्ववद्यालय के डॉ धनञ्जय पाण्डेय ने ब्रह्मसिद्धि का पाठ विश्लेषण किया एवं देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के सौ से ज्यादा प्रतिभागी सहभागी बने।