NDTV इंडिया के बाद अब न्यूज़ टाइम असम पर लगा एक दिन का प्रतिबन्ध

विकास के नाम की पट्टी आँखों पर बांध कर शायद चलना भारी पड़ सकता है. जी हाँ इस बात में कोई संदेह नहीं कि मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार देश को अलग ऊँचाइयों पर ले जा रही है पर किस कीमत पर?

यह समझना ज़रूरी है कि केवल एक दिन के लिए किसी न्यूज़ चैनल पर प्रतिबन्ध लगा देना कोई छोटी बात नहीं है. मीडिया इस देश का चौथा स्तम्भ है और आपातकाल के दौर के बाद यह पहली बार हुआ है. रवीश कुमार के प्राइम टाइम शो को तब्बज्जों न भी दे तो क्या इस बात में कोई संदेह नहीं की सरकार अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल भी कर सकती है या जो इस स्पष्ट बहुमत से केंद्र में आई सरकार के खिलाफ जायेगा उसे बार-बार तोड़ा जायेगा.

इंदिरा गाँधी के दौर में हुए आपातकाल जैसी स्तिथि क्या फिर से जागरूक होने लगी है?

हम मीडिया को जितना भी बिकाऊ कह दे या ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से खुद को पत्रकार समझने लगे पर सच्चाई यही है और इतिहास भी इस बात का गवाह है कि जब-जब इस देश पर संकट आया है इस मीडिया ने उससे उबरने में अहम् भूमिका निभाई है.

आज़ादी हो या आपातकाल हमेशा जनता के साथ लड़ाई में हमेशा प्रेस ही खड़ा नज़र आता है. मानते है कि झोला छाप पेशा कहलाए जाने वाली पत्रकारिता अब सूट-बूट में बदल गयी है और यह एक मिशन से बदल कर रोज़ी रोटी का स्त्रोत बन गयी है. पर क्या समय के साथ बदले इस क्षेत्र के नियमों में भी बदलाव आया है? कितनी आजाद है मीडिया और किस तरह के है नियम क्या इस पर भी विचार किया जा रहा है?

मैं निजी तौर पर इस बात के पक्ष में पूर्ण रूप से हूँ कि जो गलती करता है उसे सज़ा मिलनी चाहियें पर कितनी? और क्या? सरकार भी इसी कहावत पर कार्रवाई की है कि जो पकड़ा गया वही चोर है? या सिर्फ यह सियासत का खेल है? इस बात को समझना अनिवार्य है कि मीडिया हमारे क्या किसी भी देश की रीढ़ है और इसको मजबूत रखना हमारी ज़िम्मेदारी है.ndtv-india

भारत की मीडिया किस प्रकार कार्य कर रही है इसे हर कोई बखूबी जनता है और एक न्यूज़ चैनल पर एक दिन का प्रतिबन्ध लगाना तो सही है पर सिर्फ उसी चैनल पर प्रतिबन्ध लगा जो वर्तमान क्या किसी सरकार के इशारों पर नहीं चलता. एशियन ऐज, मिलेनियम पोस्ट, स्टेट्समैन व टेलीग्राफ जैसे अखबारों की सर्कुलेशन आज जितनी भी कम हो पर भरोसेमंद यही है.

देश में लाखों अखबार तो है पर लोग उन्हें बिकाऊ बोलते है, इनका खरीदार है कौन? राजनेता? उद्योगपति? या जनसंपर्क क्षेत्र?

इतनी बहस का निष्कर्ष बस यही है कि देश तो आगे बढ़ रहा है पर कितना और किस तर्ज़ पर ये समझना ज़रूरी है. सरकार पूर्ण बहुमत से केंद्र के बैठी है पर उसने कितने कांटो का ताज पहना है और कितनी आरामदायक कुर्सी है यह भी समझना ज़रूरी है. इस देश के युवा को आधुनिकता की और बढ़ने से पहले यह अच्छे से समझ लेना चाहिए की हम इस देश के नागरिक है और हमारे ही लोगो से इसे खून से सींच कर खड़ा किया है.

-हृदय गुप्ता

(हृदय गुप्ता एक युवा लेखक है जो पेशे से जनसंपर्क अधिकारी है. पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली में जनसंपर्क के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की है. वर्तमान में चंडीगढ़ शहर में जनसंपर्क के क्षेत्र में ही कार्य कर रहे है और समय-समय पर विभिन्न विषयों पर अभी लेखनी से प्रकाश डालते रहते हैं.)