महिला सशक्तिकरण, यह शब्द हर रोज सुनने में आता है। टीवी पर हर रोज इस पर घंटो बहस होती है, अखबारो में लंबे-लंबे लेख छपते हैं, कुछ खास उपलब्धियां हासिल करने वाली महिलाओं का उदाहरण देकर महिलाओं की उन्नति को दर्शाते हैं। लेकिन कुछ अद्भुत करने वाली महिलाएं तो हर सदी में रहीं हैं।  रानी दुर्गावती से लेकर रज़िया सुल्तान, रानी लक्ष्मीबाई से लेकर इंदिरा गांधी और कल्पना चावला से लेकर किरण बेदी। परंतु महिलाओं की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया।

आज  महिला सशक्तिकरण का अर्थ महिला के आर्थिक रूप से समर्थ होना समझा जा रहा है। गलत भी नहीं है, आर्थिक स्वतंत्रता-समर्थता उन्हें सशक्त तो बनाती ही है लेकिन क्या आर्थिक समर्थता ही महिलाओ को सशक्त करती है? नहीं।

एक महिला का अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना और शिक्षित होना दोनो ही अनिवार्य चरण है, उसे खुद को सशक्त करने के लिए। अगर महिला अपने अधिकारों से परिचित है तो भी वह सशक्त हो यह आवश्यक नहीं है। जब तक वह जागरूक नहीं है तब-तक सशक्त नहीं है। हमारे आस- पास ऐसी भी महिलाएं हैं जो शिक्षित भी है और उन्हें अपने अधिकारों को ज्ञान भी है, फिर भी घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न का शिकार हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि जागरूक होना अति आवश्यक है, और जागरूकता ना सिर्फ अपने और अपने अधिकारों के लिए हो बल्कि अपने आस- पास के समाज और दूसरों के हित के लिए भी हो।

जब हम अपने आस-पास यह देखते हैं कि एक बहुत ही कम उम्र की बच्ची की शादी हो रही है हम चुप रहते है, ये जानते हुए भी कि ये उस बच्ची के भविष्य के लिए अच्छा नहीं होगा और फिर कुछ समय बाद में हमें जब ये पता चलता है कि उसके ससुराल वालों ने उसे जला कर मार दिया तो भी चुप ही रहते हैं। जब हमारी कामवाली बाई हमें यह बताती है कि उसका पति या बेटा उसे रोज मारता-पीटता है , उसकी कमाई के पैसों से शराब पी जाता है, तो भी हम बस सुनकर टाल देते हैं। लेकिन अगर हमें महिलाओं की स्थिति में बदलाव लाना है, उन्हें और खुद को सशक्त करना है तो हमें आवाज  उठानी ही होगी, हमें शंखनाद करना ही होगा। अपनी सक्षमता का सदुपयोग करना ही होगा। हम यहां देख सकते है कि कामवाली बाई भी अर्थिक रुप से किसी पर निर्भर नहीं है, सक्षम है। लेकिन क्या वो सशक्त है?

अगर हम महिलाओं का सशक्त रूप देखना चाहते हैं तो हमें खुद को और एक-दूसरे को जागरूक करना होगा, एक-दूसरे के लिए आवाज बुलंद करनी होगी। पीड़ित महिला पीड़ित है वो ना तो हिन्दू है ना ही मुसलमान और ना ही किसी छोटी या बड़ी जाति की। हम सभी को एक-दूसरे को सशक्त करना होगा।


-सौम्या पांडे